मुक्तक
सजा के मांग को तेरी,तुझे दुल्हन बनाऊंगा।
चढ़ूंगा मैं अभी घोड़ी,तुझे डोली चढ़ाऊंगा।
जमाने की नही परवाह,कहना है कहे जो भी।
कसम तेरी तुम्हारे साथ अपना घर बसाऊंगा।
कहीं रांझा बना कोई,कहीं मजनू बने फिरते।
जमाने की निगाहों में, बुरा बन के सदा घिरते
यहाँ कुछ लोग ऐसे है,करें बदनाम लोगों को।
बने आशिक दिखावे का,करम अपना करे गिरते ।
सुनामी आ भी जाये तो,हमारा कुछ नही होगा।
परिंदा बन उड़ेंगे हम,ठिकाना औ कहीं होगा।
फँसे जो मोह माया में,कहीं ओ जा नही सकते।
मिला साथी नहीं जिसको,बहाना ये सहीं होगा।
तमन्ना है कि अंबर में,हमारा एक घर होता।
घटा की सेज में सोते,रहे सँग चाँद भी सोता।
उजाला चांदनी की टिमटिमाती रोशनी होती।
बताओ कौन है ऐसा,ठिकाना छोड़ कर खोता।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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