मुक्तक
2212 2212 2212 2212
बिन गोंदली के साग हा,थोरिक मिठावत नइ हवय।
बाढ़े हवय बड़ भाव हा,कोनो ह लावत नइ हवय।
फोरन बिना कइसे बता,तड़का लगाही साग के।
अब झोर गाढ़ा नइ बने, लइका ह खावत नइ हवय।
बरसात कस लागत हवय,पर जाड़ बाढ़त हे सगा।
छतरी धरय की शॉल ला,जोखा न माढ़त हे सगा।
करिया घटा हर छाय हे, सूरज तको घबराय हे।
आगी जलाये चौंक मा, पर कोन ठाढ़त हे सगा।
तिवरा तको बँदियाय गे,कीरा चना ला खाय जी।
राहर झरा दिस फूल ला, अब कोन दाना पाय जी।
बटरी भता गे खार मा,मसरी तको मुरझाय हे।
बरसात हर चौपट करे, अब कोन लू के लाय जी।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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