कहमुक़री
तीर तीर मा घूमत रहिथे।
कान तीर मा आके कहिथे।
मया मिले नइ बीते बच्छर।
का सखि भाँटो, ना सखि मच्छर।
सदा मया के लहरा लावय।
तन छूवय ता मन हरसावय।
अब तो निच्चट कर दिस परिया।
का सखि भाँटो, ना सखि तरिया।
आँखी आँखी मा ओ झूलय।
जहाँ मिले फिर रसता भूलय।
सँग मिलजावत हवय बुधारू।
का सखि भाँटो, ना सखि दारू।
शेर बरोबर वो गुर्रावय।
घूमत रहना ओला भावय।
अब दर्शन नइ होय विधाता।
का सखि भाँटो, ना सखि जाँता।
दस दस झन ला ओ हर बोहय।
लम्बा नाक गजब के सोहय।
कहाँ गवागे तँय हर साथी।
का सखि भाँटो, ना सखि हाथी।
निर्मल जेखर तन मन हावय।
ओ हरसावय जे हर पावय।
बरस लगादय आग जवानी।
का सखि भाँटो, ना सखि पानी।
जेती जावँव तेती जावच।
अनहोनी ले तको बँचावच।
तोर बिना अब कइसे बनही।
का सभी भाँटो, ना सभी पनही।
तोला निसदिन रहँव निहारत।
कम बेसी तुरते दँव झारत।
तोर बिना हो कइसे अर्पण।
का सखि भाँटो, ना सखि दर्पण।
दिनभर सरपट दौड़ लगावय।
देख रूप ला मनवा भावय।
दुल्हिन खातिर लावय जोड़ा।
का सखि भाँटो, ना सखि घोड़ा।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार15-01-2020
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