मुक्तक
मदारी कस नचावत हे, बना के देख लव भालू।
बजा के डुगडुगी देखव,कहे हमला सदा कालू।
रुलाथे ओ कभू हमला कभू ओ हर हँसावत हे।
मजा लेवत हवय भगवान हर हावय बड़ा चालू।
बना के भेजथे करिया, कहूँ ला गोरिया करके।
मरे कब कोन कइसे अउ कहाँ डोरी सबो धर के।
फँसा के मोह माया मा,परीक्षा ओ हमर लेथे।
कराथे काम जी गड़बड़, मती ला वो हमर हर के।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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