1222 1222 1222 1222
सफर में जो मिले साथी ,उसे भी साथ लेता चल।
कहीं जो अड़चने आए, सभी का हो सके गा हल।
जिसे तूँ तुच्छ समझा है, वही तो काम आता है।
सुई हीं टाँक पाता है,फ़टे जो आसतिन हो कल।
बनाता है मिटाता है मिटा के फिर बनाता है।
लगे ज्यूँ रेत की ढेरी,लहर आ तोड़ जाता है।
मजा पाता न जाने क्या,हमारी बेबसी से ओ।
कभी वो दुःख देता है, कभी उल्लास लाता है।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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