ताटक छंद
नही कहो तो सब करते हैं, करो कहो कतराते हैं।
है विचित्र यह मानुष प्राणी, बंधन से घबराते हैं।
जहाँ थूकना लिखा मना हो, वहाँ थूक कर आते हैं।
पीकदान में कहो थूकने, देख पात्र शर्माते हैं।
जहाँ पार्क को रहे मनाही, गाड़ी वही टिकाएँगे।
वहीं लिखो सौ रुपिया देना, गाड़ी तुरत हटाएँगे।
जहाँ प्रसाधन रहे मनाही, साधन वहीं बनाते हैं।
बड़े बेशरम होते हैं ये, जग में नाक कटाते हैं।
कहने की जो बात नही है, उसी बात को बोलेंगे।
जिसको कहना है जन-जन में, जुबाँ नही वो खोलेंगे।
नियम धियम में बंध कर रहना, कहते ये नाकामी है।
जब हम है आजाद हिंद के, करना नही गुलामी है।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार18221
No comments:
Post a Comment