Saturday, 6 February 2021

घनाक्षरी

जल हरण घनाक्षरी 

खटिया के चार खुरा, बिना पाटी के अधूरा, 
गाँथबे नेवार कामा, कर ले विचार तँय। 

कहूँ रखे चार पाटी, कतको रहे वो खाँटी, 
बिना खुरा पाबे कहाँ, सोंच ले अधार तँय। 

राख खुरा पाटी सँग, गाँथ ले नेवार तँग, 
सुत फिर लात तान, रोज थक हार तँय।

सुख जिनगी म पाबे,गंगा रोज तें नहाबे, 
नता रिसता ल जोंड़, जिनगी सँवार तँय। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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