बाल गीत
मोर बबा के टेड़गा लौठी, सुग्घर बने सहारा जी।
धरे बबा हर घूमत रहिथे, निशदिन आरा पारा जी।
कहूँ कुकुर हर भूँके लागिस, एक्के लौठी मारत हे।
काँय-काँय कर कुकुर भगावय, गोल्लर तक मन हारत हे।
दातुन खातिर मार गिरावय, बमरी रुख के डारा जी।
मोर बबा के टेड़गा लौठी, सुग्घर बने सहारा जी।
खेत खार जब घूमे जावय, रसता ला चतवारत हे।
कहूँ साँप बिच्छू मिल जावय, बबा कहाँ ले हारत हे।
टेड़गा लौठी मा दे मारय, भगे साँप बेचारा जी।
मोर बबा के टेड़गा लौठी, सुग्घर बने सहारा जी।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार18-02-2021
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