सार छंद
चंदा मामा तँय बतलादे, दिन भर कहाँ लुकाये।
रतिहा बेरा तँय मुस्कावत, कोन डहर ले आये।
का गलती तँय हर कर डारे, देख सुरुज घबराथस।
जइसे रतिहा होथे ताहाँ, चुपके चुपके आथस।
कभू ओढ़ चादर तँय आथस, दिखथस हँसिया जइसे।
कभू दिखे थारी कस गोला, रूप बदलथस कइसे।
पुन्नी रतिहा गजब सुहाथे, रूप लगे मन भावन।
खोर गली अउ अँगना परछी, लागे अबड़ सुहावन।
दाई खीर बना के राखे, रतिहा छत मा आबे।
अमरित के बरसा बरसावत, मन भर खा के जाबे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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