अमृत ध्वनि छंद
गाँव-गाँव मा शोर हे, जइसे होवत जंग।
ढोल नगाड़ा संग मा, उड़ियावत सब रंग।
उड़ियावत सब, रंग फगुनवा, होली आगे।
खेत खार सब, महके लागिस, फुलुवा छागे।
लइका बुढवा, अउ जवान सब, जमे ठाँव मा।
फगुवा गावय, शोर मचावय, गाँव-गाँव मा।1।
बड़ा घमंडी तँय हवस, कर ले तनिक विचार।
का धर के तँय आय हस, का ले जाबे यार।
का ले जाबे, यार बता तँय, जब मर जाबे।
सब धन दौलत, इहँचे रइही, कुछ नइ पाबे।
मया लुटा ले, मान नही ते, परही डंडी।
सब दुरिहाही, कहिके तोला, बड़ा घमंडी।2।
मरना हावय सोंच के, रहिथस बहुत उदास।
माटी के ये तन बता, अइसन का हे खास।
अइसन का हे, खास जगत मा, जे नइ छूटय।
हीरा मोती, जड़े हवय का, घर नइ फूटय।
जे आही ते, निश्चित जाही, फिर का डरना।
खा ले पी ले, मौज उड़ाले, जब हे मरना।3।
रिस्ता नाता काम के, रख सुग्घर गठियाय।
मया पिरित मा बाँध ले, देख दूर झन जाय।
देख दूर झन, जाय कहूँ तँय, कर ले जोखा।
टूटे रस्सी, गाँठ परे फिर, देथे धोखा।
कतको तँय हर,रसता जोहत, कर जगराता।
दूर होय ले, मिल नइ पावय, रिस्ता नाता।4।
बचपन बीते मौज मा, धुर्रा माटी खेल।
आय जवानी रात दिन, चिंता नून अउ तेल।
चिंता नून अउ, तेल सकेले, हपटत बीते।
घर के जोखा, नइ हो पावय, रहिथे रीते।
खींच तान मा, पता चले नइ, होगे पचपन।
सुरता आथे, गुज़रिस कइसे, पूरा बचपन।5।
आये हावस तँय इहाँ, छोड़ देव के धाम।
बिसरा झन माया फ़से, भज ले सीता राम।
भज ले सीता, राम नाम के, सुमिरन करले।
तज माया तँय, प्रभु मूरत ला, अंतस धरले।
मोर-मोर के, रटन लगाये, का तँय पाये।
फस माया मा, तड़फत हावस, जब ले आये।6।
काया माटी के बने, झन कर गरब गुमान।
घुर जाही सब एक दिन, प्रभु मा दे तँय ध्यान।
प्रभु मा दे तँय, ध्यान बरोबर, तरही चोला।
ऊपर वाला, खुद ले जाही, रथ मा तोला।
धन दोगानी, काम न आवय, ठगनी माया।
सदा रहय नइ, ये दुनिया मा, कखरो काया।7।
स्वांस चलत ले मोह हे , मरते तुरत जलाय।
जानत हे सब ठाठ ये, काम कछू नइ आय।
काम कछू नइ, आय तहाँ ले, नाता टोरय।
कपड़ा लकता, कथरी खटिया, सब ला जोरय।
फेंक दुबट्टा, माचिस मारय, देह जलत ले।
रिस्ता नाता, मान प्रतिष्ठा, स्वांस चलत ले।8।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment