रोला छंद
बाढ़त हावय भाव, आय पर नइ बाढ़त हे।
गजब गरीबी जान, सुरुज तक हर ठाढ़त हे।
कइसे करँव उपाय, मिले छइयाँ ये तन ला।
मँहगाई के झाँझ, जरावत हे तन मन ला।
कतको के हे सोंच, कहाँ वोला हे जाना।
नइ हे मोटर कार, कहाँ पेट्रोल भराना।
फिर भी परही मार, खाय के जिनिस ठठाही।
दू रुपिया के चाय, पाँच रुपिया मा आही।
कतको करव विरोध, कान मा जूँ नइ रेंगय।
भरयँ खजाना पोठ, आम लोगन ला ठेंगय।
होगे बारा हाल, गरीबन के अब थारी।
मँहगाई के मार, रोय जनता बेचारी।
मन कहिथे झन बोल, चलन दे जो होवत हे।
पर बइठे सरकार, गरीबन ला धोवत हे।
सपना बहुत दिखाय, पाय हावय आसन ला।
करत दिखे नइ काम, सुनाथे बस भाषण ल।
जे मन बोलय साँच, आँच हरदम वो पाथें।
लबरा मन के राज, साँच मन डंडा खाथें।
झन संगी तँय बोल, नही ते हो करलाई।
चुप रह दिलीप सुजान, इही मा हवय भलाई
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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