पी के दारू
पी के दारू,गिरे उतारू।
हमर बुधारू,संग समारू।
बिहना जावय,दारू लावय।
पी के आवय ,शोर मचावय।
रोज बिहानी ,इही कहानी।
सुनलव संगी,मोर जुबानी।
गारी गल्ला,होवय हल्ला।
मारय लोगन,भागय पल्ला।
बाई रोवय,रोवत सोवय।
लइका पिचका,सब ला ढोवय।
बेंचय थारी,ब्यारा बारी।
पारी पारी,रहे उधारी।
नइ हे खाना,ठौर ठिकाना।
दरुहा सोंचय,चल मरजाना।
दारू करथे,कतको मरथे।
जिनगी बरथे,घरो उजरथे।
लोगन कहिथे,कहिते रहिथे।
तोर करे ला, सबझन सहिथे।
छोडव दारू,सुनव बुधारू।
संग समारू, बनव जुझारू।
रचनाकार, दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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