जाड़ा
जाड़ा अब्बड़ लागत हे।लइका मन तक जागत हे।
कोनो सुत नइ पाये हे।जाड़ा के दिन आये हे।
ठण्डा ठण्डा हवा चले।जावय बाहिर कोन भले।
कतको काम जरूरी हे।रहना घर मजबूरी हे।
स्वेटर साल लदाये हे।गरम अँगेठी भाये हे।
कहाँ रजाई छूटत हे।भीतर खुसरे घूटत हे।
जम्मो कथरी साँट डरे।बेरा चढ़गे खाट धरे।
टस ले मस नइ होवत हे।बेर कुबेर ग सोवत हे।
कोन नहाही पानी मा।दुख भारी जिनगानी मा।
कंचन काया अकड़ जही।बात कहत हँव मान सहीं।
सुर सुर हवा हिलोरत हे।जिनगी नइया बोरत हे।
कटरत हावय दाँत घलो।बिस्तर भीतर चलो चलो।
गरम बनादे चाय अभी।गरम पकोड़ा लान सभी।
जाड़ा ला निपटाना हे।जल्दी दूर भगाना हे।
ये जाड़ा के आये ले।बरसा दूर भगाये ले।
गरमी सुरता आवत हे।तन ला जेन जलावत हे।
गरमी जाड़ा या बरसा।जादा देवत हे तरसा।
अति झन होवय भाई जी।नइते हो करलाई जी।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment