अत्याचार
कहाँ हवस भगवान बता।
लइका मन ला झन ग सता।
होवत अत्याचार इहाँ।
मानत हे भगवान जिहाँ।
रकसा घर घर बाढ़त हे।
दुख देये बर ठाढ़त हे।
अइसन मन के नास करौ।
मारे खातिर बाण धरौ।
नारी निर्बल मानत हे।
अबला ओला जानत हे।
बल से अत्याचार करे।
मन माफिक हथियार धरे।
उम्र तको नइ देखत हे।
रद्दा बाट म छेंकत हे।
बड़का धर ले जावत हे।
लइका कहाँ बचावत हे।
बिनती ला नइ मानत हे।
धरे कटार ल तानत हे।
कोनो ला डर्राय नहीं।
मारत तक थर्राय नहीं।
अब्बड़ सोर मचावत हे।
हिरदे ला दहलावत हे।
काखर बल मा गरजत हे।
नइ मानय जे बरजत हे।
मनखे मन सब हार चुके।
मन अपनो सब मार चुके।
अब तो तोरे आस हवै।
आबे ये बिसवास हवै।
तीर कमान धरे झन आ।
चक्र सुदर्शन झन दिखला।
तिरसुल काम न आवत हे।
गदा कहाँ चलपावत हे।
किसिम किसिम हथियार धरे।
ये बैरी मन काम करे।
येखर काट निकालव ना।
नवा नवा कुछ लानव ना।
मारव जइसे भी करके।
काँपय जम्मो मन डर के।
अइसन कुछ तो काम करौ।
जन जन मन के पीर हरौ।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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