Tuesday, 13 July 2021

सरसी छंद

  झिल्ली 

झिल्ली के बिन काम चले ना,बेबस है इंसान। 
पर झिल्ली होता है भाई,बहुत बड़ा शैतान।

छोटी सी छोटी चीजें अब,झिल्ली भर बेंचाय। 
बड़े बड़े झिल्ली में भर के,धर सब घर ले आय। 

पाउच या मिक्चर हो कोई,शेम्पू बिस्किट मान। 
हल्दी मिर्च नमक या धनिया,पोहा तेल पिसान। 

कपड़ा पानी बर्तन झाड़ू,खेल खिलौने दाल। 
झिल्ली में सब भर कर आते,बन जाते जंजाल। 

डिस्पोजल भी पाट रहा है,हराभरा मैदान। 
मच्छर का घर बन जाता है,दुख पाये इंसान। 

नाली में झिल्ली है जाता, बंद करे सब द्वार। 
खेत खार चौपट हो जाता,खेती हो बेकार।  

पर कुछ काम रहे झिल्ली का,जो सबको स्वीकार। 
पानी से बचने के खातिर,लोग लगाते द्वार। 

छान्ही के ऊपर छाने को,ढँकते और अनाज। 
पानी से गर बचना है तो,झिल्ली है सरताज। 

जहाँ जरूरी लगता है बस,वहीं करें उपयोग। 
वरना झिल्ली से बढ़ सकता,भारी भरकम रोग। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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