हाइकु
बरस पानी
झन कर नादानी
धरा सुखागे।
घाम बाढ़े हे।
सगा कस ठाढ़े हे।
कहाँ भगाँव।
पाँव जरथे।
रेंगत अखरथे।
बिना छाँव के।
नदी सुखागे।
रेती सबो खवागे।
टूरा पोट्ठा गे।
बादर आथे।
हमला बिजराथे।
मटक देथे।
भोग मनखे।
पाँव कुल्हाड़ी मारे।
धरा उजारे।
धीरज धर।
मानसून तो आही।
गिरय नही।
देश बाढ़ गे।
कारखाना बना के।
खेत खन के।
खाना बने खा।
जहर मिलाय हे।
सबो खाय हे।
उड़जा पंछी।
ठिकाना खतम हे।
भू हजम हे
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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