Tuesday, 13 July 2021

रोला छंद

मेंछा

मेंछा मा दे ताव,जाँघ मा थप्पी मारय। 
खेलय दंगल दाँव, उठा के तहाँ पछाड़य। 
जाने का हे बात,मरद के मेंछा मा जी। 
कतको तो घबराय,देख के होजय राजी। 

कतको मेंछा मोंठ,कतक के पातर पातर। 
कतको गुच्छा दार, रहय कुछ चातर चातर। 
कुछ के जस तलवार,रखे कुछ चुटकी भर जी। 
कुछ के धारी दार, रखय कुछ कली अमर जी।

नत्थू के ओ मूँछ,रहे अमिताभ बखानय।
मेंछा होथे शान,मरद ला झट पहिचानय।  
केस्टो तक के मूँछ, रहे माछी के जइसे। 
पकड़ न पावय हाथ, ताव फिर देवय कइसे।

लड़े कभू नइ मूँछ, मगर ओ ताव बताथे। 
परे छुरा के धार,सफाचट भी हो जाथे। 
सोला ले शरुवात,मरत तक जामे रहिथे। 
करिया पाका मूँछ,कहानी पूरा कहिथे। 

अभिनन्दन के मूँछ,देश के आन बचाये। 
विग सोला दिस मार,शान से वापस आये।   
देखत रहिगे पाक, मूँछ तक छू नइ पाइस।  
नोचत रहिगे बाल, पाक अबड़े पछताइस।

बुढ़वा मन के भाव, लाम मेंछा ले बाढ़े। 
बन मुखिया सरदार, सबो के आगू ठाढ़े।
मेंछा दे के ताव,हाथ ला फेरत रहिथें। 
हवय मूँछ मा धार, ताव देवत सब कहिथें

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment