कुण्डलियाँ
पानी तरिया मा रहे,रहे खेत खलिहान।
नदिया नरवा ढोड़गी,झिरिया कुआँ खदान।
झिरिया कुआँ खदान,सबो मा पानी पाते।
जन जीवन खुशहाल,धरे पग जेती जाते।
तइहा के ये बात,बताथे हमला नानी।
अब तो हाहाकार,मिले ना चुरुवा पानी।1।
कइसे होही सोंचथौं, ये जग के कल्याण।
मनखे, मनखे ले लड़े,रोज चलावय बाण।
रोज चलावय बाण, मारथे अपने भाई।
लहू बहे हर रोज,मचे घर घर करलाई।
करदव कछू उपाय,रहय सब मनखे जइसे।
हो जावय कल्याण,सोंचथौं होही कइसे।2।
खोपा मा गजरा सजा,अउ कलगी दे खोंच।
बिंदी माथा मा लगा,अउ जादा झन सोंच।
अउ जादा झन सोंच,रूप बड़ सुंदर लागे।
शहरी छोरी जान,तोर ले दुरिहा भागे।
लाल लिपिस्टिक मार,लगत हे ओमन धोपा।
तोर रूप चमकाय,लगे जे गजरा खोपा।3।
अँधियारी छाई रही,राह दिखा ना कोय।
चंदा भी आया नही,रहिरहि बादल रोय।
रहिरहि बादल रोय,समझ ना पाये कोई।
गरज चमक के संग,बदरिया काहे रोई।
नाचय झूमय मोर,पंख फैला के सारी।
अब तो होली शाम,छटा ना ये अँधियारी।4।
छत छतरी छतराय हे, देवत हावय छाँव।
ददा बने छतरी रहे,जरय कभू नइ पाँव।
जरय कभू नइ पाँव,रहे ओ सुख के सागर।
कतको तँय हर मांग,देत ओ आगर आगर।
खाली रहे न पेट,मिलय भर पतरी पतरी।
जिनगी भर सुख झेल,ददा के हे छत छतरी।5।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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