Thursday, 13 January 2022

सार छंद- प्रभु जी

सार छंद- प्रभु जी 

कइसन दुनिया तँय निर्माये, हे प्रभु आज बतादे। 
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज दिखादे। 

कहूँ ठउर मा घाम बहुत हे, कहूँ ठउर मा जाड़ा। 
कहूँ पियासे बिन पानी के, निशदिन दिखे अखाड़ा। 

जिहाँ दिखे पानी के रेला, बाढ़ उहों तँय लादे। 
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे। 

कहूँ रेत भंडार भरे तँय, कहूँ कटाकट झाड़ी। 
कहूँ बनाये पर्वत खाई, कहूँ बनाये खाड़ी। 

आधा ले जादा दुनिया मा, सागर तहीं बनादे। 
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे।  

लबरा मन धनवान बने हे, बपुरा इहाँ पिसावय।  
मिहनत कस मन सुक्खा रोटी, चोर मलाई खावय। 

कइसन माया नगरी प्रभु जी, सब ला तँय उलझादे।
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

 

Wednesday, 12 January 2022

बाल गीत

बाल गीत- सुबह सवेरे 

सुबह सवेरे चिड़िया आई। 
मैं सोया था मुझे जगाई। 

बोली सुबह हुई उठ जाओ। 
देखो सूरज छत पर आओ। 

ठंडी हवा चली इठलाती। 
मध्यम-मध्यम गुनगुन गाती।

हरी-भरी है दुनिया सारी। 
घूम रहे हैं सब नर नारी। 

धुँआ-धुँआ-सा जग भर छाया। 
कैसी है ये प्रभु की माया। 

हर तिनके पर ओस पड़ी है। 
लगता है ज्यों हीर जड़ी है। 

पूर्व दिशा की देखो लाली। 
मंत्र मुग्ध है करने वाली।

ऐसा अवसर अब मत खोना। 
दिन चढ़ते तक कभी न सोना। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सरसी छंद

सरसी छंद-  बोल 

मुँह दे हावय बोले बर ता, फोकट के झन बोल।  
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

जेन विषय के ज्ञान नहीं हे, रख झन कभू विचार। 
बहस चलत हे तेन बीच मा, जाके मुँह झन मार। 

कतका ज्ञान भराये अपने, अन्तस  तनिक टटोल। 
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

लपर-लपर जे बोलत रहिथे, तेन लपरहा ताय। 
बे मतलब बड़बड़ जे करथे, पगला नाम धराय। 

अइसन मन के शब्द हमेसा, होवत फुटहा ढोल।
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

मजा उड़ाले चुप रहि के तँय, करले तनिक विचार।  
सुनके सबके बात समझले, तभे बोलना सार। 

मुँह ले निकले शब्द हमेसा, होवत हे अनमोल। 
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Saturday, 1 January 2022

कुकुभ छंद

कुकुभ छंद-थपरा 

दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 
जिंदा मन के बात छोड़ तँय, जान फूँक दय खपरा मा। 

चेत बिचेत कभू जे होवय, मार झमाझम पर जाथे। 
आलस के अँधियारी छाये, आँखी जग ले बर जाथे। 

छमता ले जादा भर जाथे, पाँच साल के बपरा मा। 
दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 

खेल कूद सब छोड़े बइठे, नइ हावय संगी साथी। 
थपरा देखत डर के मारे, लीलत हे सइग्घो हाथी। 

तोर रहत लइका ले होरा, कहाँ भूँजाही छपरा मा।  
दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 

परथे जब ये गाल चटाचट, पाँचो अँगड़ी छप जाथे। 
जिनगी के ये रेल तहाँ फिर, पटरी छोड़े कब जाथे। 

मया गजब के तको भराये, दाई तोरे थपरा मा। 
जिंदा मन के बात छोंड़ तँय, जान फूँक दय खपरा मा। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

आल्हा

आल्हा 

सड़क बने ले सुन रे बाबू, तोर कभू नइ होय विकास। 
ये ब्यापारी मन के रसता, जे लूटे बर आही पास। 

तोर करा गाड़ी ना घोड़ा, कब जाबे तँय होय सवार। 
मोटर गाड़ी ब्यापारी के, पइसा ओ कर देही पार। 

सड़क बने ले आही ओ हर, लालच दे ले लेही खेत। 
तँय बनजाबे नौकर ओखर, तोर मुठा मा भरही रेत। 

ठेला ले ओ कर सुरुवाते, बन जाही धीरे से सेठ। 
बेघर ओ तोला कर देही, झन रह बाबू निच्चट ठेठ। 

तोर पिसाही जाँगर पूरा, ओ बइठे करही आराम।
सोना ला जब तँय उपजाबे, ओ लेही कौड़ी कस दाम।   

सड़क बने ले मानत हावँव, गाँव शहर बढ़िया जुड़ जाय।  
छिन मा आना छिन मा जाना, सुविधा के अंबार लगाय। 

चिंता अतके मोर हवय जी, गाँव शहर कस झन बन जाय। 
भोला भाला मोर गँवइहा, झन शहरी ओ रंग चढ़ाय। 

कहिथें भारत गाँव बसत हे, संस्कृति राखय जिहाँ सहेज। 
शहरी छइहाँ पड़ जाये ले, लूट पाट हो जाही तेज।

छोड़ किसानी नव जवान मन, शहर डहर सब जही खिंचाय। 
माटी के सेवा खातिर फिर, खून पछीना कोन बहाय। 

सड़क बनाये गाँव गाँव मा, सोंच रखे जी होय विकास। 
पर मोला तो गड़बड़ लागे, झन हो जावय सबो विनाश। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार


लावणी गीत

लावणी छंद गीत 

पुरखा मन के सपना दाई, आवत बेरा लागिस ओ।
एक नवम्बर दो हजार के, भाग हमर हर जागिस ओ। 

छत्तीसगढ़ हे नाम ह दाई, छत्तीसगढ़ही बोली हे। 
तोर अंग मा पर्वत जंगल, धनहा भाठा डोली हे। 
छत्तीसगढ़िया के मिहनत ले, घोर अँधेरा भागिस ओ। 

 हरियर लुगरा तन मा पहिरे, अछरा हर लहरावत हे। 
सुआ ददरिया कर्मा पंथी, पडकी मैना गावत हे। 
नाचत कूदत जिनगी लागे, अब सुराज हर आगिस ओ। 

तोर सवाँगा खातिर दाई, गाँव सड़क चमकावत हन। 
तोर प्यास बर पानी खातिर, नदिया बांध बनावत हन। 
तोर दिए हीरा लोहा ले, कोठी हमर भरागिस ओ। 

कोना-कोना के विकास बर, जिला बने बत्तीस हवय। 
पर बस्तर अबतक नइ सुधरे, तेखर हमला टीस हवय।  
अपने भाई बहिनी ऊपर, गोला काबर दागिस ओ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

रोला छंद

रोला छंद 

कर ले पूजा पाठ, बचे नइ हे जिनगानी। 
जाँगर सबो सिराय, सिरागे तोर जवानी। 
ताका झाँकी छोड़, भक्ति के रसता धर ले। 
अपनो सरग सँवार, ध्यान दे पूजा कर ले । 

बचपन बीते खेल, जवानी मा इतराये। 
पइसा ला भगवान, समझ के खूब कमाये। 
अब होगे लाचार, तभो नइ कहना माने। 
मोर मोर सब मोर, कहे तँय नइ पहिचाने। 

अब तो रसता देख, लिवाये कब ओ आही। 
बिन पूछे ओ दूत, धरे तोला ले जाही। 
रहि जाही सब चीज, संग काहीं नइ जावय। 
जेन जपे श्री राम, धाम बस वो ही पावय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार