चौपई छंद
गजब गिराये तँय भगवान।
अब हो जाही सुग्घर धान।
काल रहिस हे जिहाँ वीरान।
बारिस कर दे हव वरदान।
खेत खार सुग्घर हरियाय।
पानी सँग खातू ला पाय।
मगन होय झूमय लहराय।
देख किसनहा मन हरसाय।
बरसा होइस मुसला धार।
उर्रा होगे खेती खार।
नदिया तरिया भरगे झार।
फँसे नाव कर देहव पार।
अब तो बाढ़ी ले सब खाय।
घर-घर घी के दिया जलाय।
आनी बानी जिनिस लिवाय।
मेंछा तान गजब अँटियाय।
जय गणपति जय हो गणराज।
असने हरदम रखिहव लाज।
दुखिया मन के करिहव काज।
पूजन करबो सुग्घर साज।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
बहुत ही सुग्घर रचना गुरुजी
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