रचना- दिलीप कुमार वर्मा
कुकरा बासत निकलय घर ले। काँध म नागर लौठी कर ले।
बइला सँग मा जाय किसनहा। जोतय जाके डोली धनहा।
तता तता अर्रावत रहिथे। जोर ददरिया गावत रहिथे।
बइला सँग मा रहे मितानी। दोहा पारय आनी बानी।
पाही ऊपर पाही बढ़जय। बेरा तक हर ऊपर चढ़जय।
चेत कहाँ बेरा के राहय। खेत जोतना पूरा चाहय।
तर-तर तर-तर बहय पछीना। पर साहस भर राखय सीना।
बइला तक मन संग निभावयँ। पाही पाही जोते जावयँ।
नरी सुखावय पीयय पानी। जाँगर पेरत करय किसानी।
बासी धर बाई जब आवय। खाये बेरा ही सुसतावय।
मिहनत ले ओ अन उपजाथें। सब ला देथे तब खुद खाथें।
तभे अन्न दाता कहलाथें। देव असन सबझन हा भाथें।
अपन हाथ मा काम अजब हे। आज काल तो दाम गजब हे।
भटके बर नइ लागय येती। खेती होथे अपनो सेती।
धन्य-धन्य तँय होय किसनहा। तोर रहत मुसकावय धनहा।
तोरे देहे हम सब खावन। आज तोर सब महिमा गावन।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
वाह वाह गुरुजी
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